enlightenment meaning in hindi-प्रबोधन से आप क्या समझते हैंI
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enlightenment meaning in hindi-प्रबोधन से आप क्या समझते हैं? क्या यह मानवीय चेतना का स्वाभाविक स्फुरण है ? समाज विज्ञान के दर्शन के सन्दर्भ में विवेचन कीजिए।
(What do you understand by enlightenment? Is it the natural phenomena of human consciousness? Discuss in the context of philosophy of Social Science)
आधुनिक युग के प्रबोधन का स्वरूप क्या है ?
(What is the form of enlightenment of modern age ?)
प्रबोधन को आधुनिक समाज विज्ञान के रूप में विवेक और विज्ञान ने किस प्रकार प्रभावित किया है ?
(How has the modern social science been semblanced by the enlightenment through reason and science ?)
"वर्तमान वैज्ञानिक युग में प्रबोधन मानवीय विवेक के स्वाभाविक बौद्धिक चिन्तन का परिणाम है जो सामाजिक जीवन को केवल उसके भौतिक पक्ष से संयुक्त कर उसका भौतिक विज्ञान के समान अध्ययन करना चाहता है। इस कथन की व्याख्या कीजिए।
("In this age of scientific development, enlightenment has emerged in the natural sequence of intellectual reasoning which insist to study society's life on the principles of physics, observing its conjunction with materialism Explain this statement.)
उत्तर- enlightenment meaning in hindi पाश्चात्य देश का आदि युग ग्रीक युग या जिसे सौन्दर्य एवं कला का युग कहा जाता है। इस समय का समाज सौन्दर्य और कला का उपासक एवं सामंजस्य का प्रेमी था। इस समाज की पद्धति संश्लेषणात्मक थी जिसमें 'सत्यम् शिवम सुन्दरम् के समन्वय की अनुभूति होती थी। मध्यकाल में समाज ईसाई धर्म का दास बन गया था। समाज के सभी सिद्धान्त एवं विचार ईसाई धर्म से प्रभावित थे। इस समाज में ईसाई धर्म के प्रभुत्व को स्थापित करने के लिए अरस्तू के तर्कों को तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता था। मध्यकालीन यूरोप में व्यक्ति, समाज और राष्ट्र तीनों पर पोप का सार्वभौम अधिकार था परन्तु जब रूढ़िवाद और निरंकुश धर्म शासन में उत्तरोत्तर कठोर एवं हीनता होने लगी तो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र अपने आपको धार्मिक कुचक्र से मुक्त करने का प्रयास करने लगा जिससे धार्मिक अन्धविश्वास के प्रति विद्रोह होने लगा। उस युग में सत्य का मानदण्ड पोप का आदेश था जिसे धर्मगुरुओं ने अपने आदेशों का सिक्का जमाने के लिए तर्क का प्रयोग करना प्रारम्भ कर दिया था। जो उनके लिए घातक सिद्ध हुआ क्योंकि तर्क के कारण ही यूरोप में बुद्धिवाद, विज्ञानवाद एवं स्वातन्त्रवाद का अभ्युदय हुआ जिसके कारण समाज में धार्मिक आदेश निर्मूल साबित हुए।
जब मध्यकालीन समाज के अन्त में व्यक्तिवाद एवं स्वतन्त्रवाद की लहर दौड़ रही थी तो 145 ई. पू. में एक महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना घटित हुई। पूर्वीय यूरोपीय साम्राज्य की राजधानी कुस्तुनतुनियाँ पर तुर्कों का अधिकार हो गया जिससे कई ग्रीक विचारक कुस्तुनतुनियों से भागकर समस्त यूरोप में फैल गये जिससे ग्रीक विचारों का (विशेष रूप से प्लेटो एवं अरस्तू) प्रसार समस्त यूरोप में फैल गया। इसके साथ ही ग्रीक कला के प्रतीकों का और ग्रीक साहित्य के ग्रब्यों की पाण्डुलिपियों का प्रबल अन्वेषण होने लगा। ऐसी स्थिति में यूरोप का व्यक्ति, समाज और राष्ट्र धार्मिक आदेशों की अपेक्षा ग्रीक कला एवं साहित्य का अत्यधिक आदर करने लगा। इसका लैटिन सहित कई भाषाओं में अनुवाद भी हुआ। इस क्षेत्र में कई राजाओं, सामन्तों, धर्मगुरुओं ने सहयोग किया। इसी बीच 1492 ई में कोलम्बस ने अमेरिका और 1498 ई. में वास्कोडिगामा ने भारत (समुद्री मार्ग) की खोज की।
प्रबोधन युग (The Enlightenment Age)-आधुनिक दार्शनिक एवं सामाजिक विचारधारा की उत्पत्ति मध्ययुगीन समाज, उनकी संस्थाओं एवं मान्यताओं के विरुद्ध विरोध के परिणामस्वरूप हुई थी। उसमें धार्मिक आस्था एवं विश्वास के स्थान पर बुद्धि की प्रधानता को स्वीकार किया गया था। यूरोप में बुद्धिवाद एवं अनुभववाद के प्रसार के कारण व्यक्तियों के मन में स्वतन्त्र चिन्तन का विकास हुआ जिसके कारण व्यक्तियों के जीवन दृष्टिकोण में पर्याप्त परिवर्तन हुआ।
सोलहवी एवं सत्रहवी शताब्दी से स्वतन्त्र विल्सन एवं नवीन विचारों का प्रारम्भ हुआ परन्तु इसका अट्ठारहवीं शताब्दी में प्रचार एवं प्रसार अत्यन्त विस्तृत रूप से हुआ इसीलिए विशेष रूप से अट्ठारहवी शताब्दी को प्रबोधन की शताशी (The Century of Enlightenment) कहा जाता है। यह समय सभी बौद्धिक प्रवृतियों का उच्चतम बिन्दु था। इस समय मानव जीवन के सभी पक्षों को बोधगम्य बताने का प्रयास किया गया।
सुप्रसिद्ध फ्रांसीसी विचारक एवं दार्शनिक वॉल्टेयर (Voltaire) को प्रबोध काल का प्रतिनिधि विचारक कहा जाता है। प्रबोध काल की सर्वाधिक ख्याति फ्रांस में हुई थी यद्यपि इसका विकास यूरोप के अन्य देशों में भी हुआ था। इस समय की प्रमुख मान्यता यह थी कि मानवीय बुद्धि के पास अपार क्षमता है जिसके द्वारा वह प्रकृति के गहनतम एवं गूढ़ रहस्यों को आसानी से अपनी बुद्धि, विवेक से समझ सकता है। यद्यपि इस काल के बाद की विचारधारा बुद्धि एवं विवेक की मान्यता के विरुद्ध विकसित हुई थी जिसे विचारधारा का युग कहा जाता है।
प्रमोचन का स्वरूप (Form of Enlightenment)- पन्द्रहवीं शताब्दी से लेकर सत्रहवीं शताब्दी तक के दार्शनिक विचारों को आधुनिक विचार कहा जाता है। इस समय समस्त यूरोप एवं विशेष रूप से इटली में साहित्यिक, कलात्मक एवं सांस्कृतिक पुनर्जागरण हुआ और जर्मनी में विशेष रूप से सार्टिन लूबर के प्रयास से धर्म सुधार आन्दोलन हुआ जिसके परिणामस्वरूप प्रोटेस्टेण्ट धर्म का भी अभ्युदय हुआ। इन दोनों को सांस्कृतिक पुनर्जागरण (Renaissance) भी कहा जाता है। इससे यूरोप के समाज में सामूहिक तांस्कृतिक क्रान्ति हुई। इसे प्रयोचन (Enlightenment) भी कहा जाता है। जब मध्ययुगीन समाज जर्जर हो गया और उसके सभी मूल्य जीर्ण-शीर्ण हो गये तो पुनर्जागरण के कारण प्रचोचन का उदय हुआ जिसमें चर्च के विचारों की प्रधानता समाप्त हो गयी थी। उसके स्थान पर बुद्धि, विवेक एवं तर्क के आधार पर वैज्ञानिक पद्धतियों का विकास हुआ। प्रवोधन के कारण आधुनिक युग में ईसाई धर्म के धार्मिक रूढ़िवाद, धार्मिक अन्धविश्वास एवं धार्मिक मान्यताओं में सुधार हुआ और तर्क, बुद्धि, विवेक एवं विज्ञान का विकास हुआ। इसकी निम्नलिखित विशेषताएँ हैं-
(1) चर्च की अवमति (Diminishing of Church)-
enlightenment meaning in hindi मध्यकालीन यूरोप में चर्च सर्वाधिक शक्तिशाली संस्था थी। उस समय सत्य का मापदण्ड पोप का आदेश या जिसकी अवज्ञा दण्डनीय थी परन्तु प्रबोधन के कारण जब बुद्धि एवं विवेक का अभ्युदय हुआ तो नवजागरण के कारण चर्च की प्रभुता के प्रति विद्रोह होने लगा। ईसाई धर्म की प्राचीन संस्था कैथोलिक धर्म के अत्याचारों से जनता त्रस्त थी अतः जब मार्टिन तूबर ने धर्म-सुधार आन्दोलन का प्रारम्भ किया और प्रोटेस्टेण्ट धर्म की स्वापना की तो चर्च की मान्यताओं का अन्त हुआ और कैथोलिक धर्म में भी सुधार हुआ। धर्म-सुधार आन्दोलन के कारण व्यक्ति एवं समाज में बुद्धि (reason) एवं विज्ञान का विकास हुआ जिससे सामाजिक विचारों एवं वैज्ञानिक अनुसंधानों में विश्लेषणात्मक विकास एवं अनुसंधान हुआ। इसी के कारण प्राकृतिक विज्ञानों के समान समाजशास्त्र के अध्ययन का प्रयास किया जाने लगा।
(2) वैज्ञानिक उन्नति (Increasing of Science)-
enlightenment meaning in hindi प्रबोधन के कारण आधुनिक युग में भौतिक विज्ञान का सबसे अधिक विकास हुआ। ईसाई धर्म की मान्यता थी कि सृष्टि का केन्द्र पृथ्वी है और सृष्टिकर्ता ईश्वर स्वर्ग से समस्त वृष्टि साम्राज्य का संचालन करते हैं। शैतान के उकसाने पर आदि मानव ने निषिद्ध फल खा लिया वा जिससे विश्व में दुःख एवं पाप का साम्राज्य विकसित हुआ। ईसाई मत के अनुसार जब धर्मगुरु पोप के आदेशों पर चलता है तो मनुष्य इस दुखपूर्ण और पापमय संसार से मुक्ति पाकर स्वर्ग में ईश्वरीय आजब्द का उपभोग कर सकता है। ईसाई धर्म की इस मान्यता को भौतिक विज्ञान के विकास ने गहरा धक्का दिया। रोजर बेकन, लियोनार्दो द विन्सी ने ईसाई धर्म की सान्यता की जड़े हिलाई और कॉपरनिकस ने सिद्ध किया कि न तो पृथ्वी सृष्टि का केन्द्र है न तो सूर्य पृथ्वी का चक्कर लगाता है बल्कि सृष्टि का केन्द्र सूर्य है और पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है।
गैलीलियो, केपलर एवं अनेक अन्य वैज्ञानिकों ने यह तर्क, बुद्धि एवं अनुसंधान के आधार पर सिद्ध किया वा कि पृथ्वी इस विशाल सृष्टि का लघु खण्ड है और मानव एक साधारण प्राणी है। ईश्वर,
स्वर्ग एवं पारलौकिक सुख की कल्पना धार्मिक एवं कोरी कल्पना है। अतः इस आधार पर इस जीवन में सुखओं का त्याग करना युक्ति संगत नहीं है। मानव जीवन जीने के लिए है मरने के लिए नहीं। इसीलिए मानव जीवन को सुखी एवं समृद्ध बनाने के लिए वैज्ञानिक खोज एवं अनुसंधान किये गये जिससे विज्ञान का अत्यधिक विकास हुआ। इसी के कारण औद्योगिक क्रान्ति का अभ्युदय हुआ और धीरे-धीरे समस्त विश्व में मशीनीकरण एवं प्रौद्योगिकी का विकास हुआ।
प्रबोधन के कारण जब वैज्ञानिक अन्वेषण एवं अनुसंधान हुए तो बारूद की खोज से युद्ध कला मैं भी भारी परिवर्तन हुआ। छापे की मशीन से ज्ञान के प्रकाश को चर्च की चारदीवारों से निकालकर चारों ओर फैलाया। दूरबीन के आविष्कार से गणित, ज्योतिष और सौरमण्डल के ज्ञान में क्रान्ति हुई। कुतुबनुमा के आविष्कार से नये-नये देशों को खोजने में सहायता मिली। इसी प्रकार वैज्ञानिक प्रगति के कारण जब उत्पादन के नये-नये साधनों का उपयोग होने लगा और उत्पादन में क्रान्ति आ गई तो मानव धर्म के संकुचित क्षेत्र से बाहर आकर लौकिक सुखों के लिए ज्ञान एवं विज्ञान को स्वीकार करने लगा।
(3) बौद्धिकता (Rationality)-
enlightenment meaning in hindi मध्ययुगीन दर्शन एवं समाज धर्म केन्द्रित होने के कारण विश्वास प्रधान था। ज्ञान धर्मग्रन्यों तक ही सीमित था और धर्मग्रन्य धर्मगुरुओं तक। धर्मगुरुओं एवं पादरियों ने सामान्य जनता में अन्धविश्वास का प्रसार किया था परन्तु पुनर्जागरण, प्रबोधन एवं विज्ञान के विकास के कारण चर्च के प्रति अन्धविश्वास का अन्त हो गया जिसके कारण मानव सभी विषयों पर स्वतन्त्र चिन्तन एवं मनन वैज्ञानिक तरीके से करने लगा था। आधुनिक युग में प्रत्येक विषय का तार्किक, वैज्ञानिक एवं सत्य का अनुसंधान होने लगा। इस युग में बुद्धि, विवेक एवं विज्ञान का प्रभाव प्रत्येक दक्षेत्र में था। इसके किसी भी तथ्य को स्वीकार नहीं किया जाता था। इस प्रकार इस युम में अन्धविश्वास एवं रूढ़िवादिता का लगभग अन्त हो गया वा और उसके स्थान पर ज्ञान एवं विज्ञान का विकास हुआ।
(4) व्यक्तिवाद (Subjectivism)-
enlightenment meaning in hindi आधुनिक युग में जब चर्च के प्रति विद्रोह की प्रवृत्ति का विकास हुआ तो लोगों में व्यक्तिवादी भावना का विकास हुआ क्योंकि अब आप्त वचनों एवं वर्मगुरुओं के वचनों को प्रमाण नहीं माना जाता था। सभी विषयों एवं तथ्यों पर स्वतन्त्र विचार से निरीक्षण एवं परीक्षण के कारण लोगों में व्यक्तिगत विचारों का महत्त्व बढ़ा। व्यक्ति को अपना ही निर्णय मान्य होने लगा। इस प्रकार से लोगों के विचारों में मौलिकता का भी विकास हुआ। स्वतन्त्र चिन्तन, स्वतन्त्र भावना एवं स्वतन्त्र कर्म के कारण ही इस युग को बौद्धिक युग या प्रबोधन युग कहा जाता है। इस युग को वैज्ञानिक युग भी कहा जाता है क्योंकि सभी विषयों एवं तथ्यों में वैज्ञानिक पद्धति का प्रयोग होने लगा।
(5)मानवतावाद (Humanism)-
enlightenment meaning in hindi मध्यकालीन यूरोप में धार्मिक अन्धविश्वास, अन्धानुकरण एवं पुराणपंथी प्रवृत्तियों एवं भावनाओं का बोलबाला था परन्तु पुनर्जागरण, धार्मिक आन्दोलन एवं प्रयोधन के कारण जब ज्ञान, विज्ञान का विकास हुआ तो मध्ययुगीन परम्पराओं और धर्म प्रभावित सामाजिक जीवन का अन्त हो गया। अब मनुष्यों में देवी-देवताओं के स्थान पर मनुष्य के प्रति आस्था का विकास हुआ जिससे मानवतावाद का विकास हुआ। अब समाज की सेवा को ही ईश्वर की यथार्थ सेवा का रूप दिया गया। पारलौकिक सुखों के स्थान पर लौकिक जीवन को सुखी और सम्पन्न बनाने के लिए प्रयास किये गये। इस प्रकार मानव की दृष्टि ईश्वर केन्द्रित न होकर मानव केन्द्रित हो गई। मैकियावेली का 'प्रिन्स', दाँते का 'डिवाइन कॉमेडी', पेकार्ट का 'सानेट' आदि कृतियाँ मानवतावादी प्रवृत्तियों की प्रबल समर्थ थीं।
(6) आधुनिक दर्शन का योगदान (Contribution of Modern Philosophy)-
आधुनिक दर्शन के जनक देकार्त हैं, परन्तु इनके पहले अनेक दार्शनिकों एवं सामाजिक विचारकों में आधुनिक युग या प्रबोधन के गुण मिलते हैं। निकोलस एक पादरी थे लेकिन उन्होंने निरंकुश सत्ता का विरोध किया और कहा कि राजा पर प्रजा के प्रतिनिधियों द्वारा और पोप पर पादरियों की समिति द्वारा नियन्त्रण होना चाहिए। इनके विचारों में ग्रीक दर्शन का प्रेम, गणित, विज्ञान, मानव स्वतन्त्रता एवं महत्ता, बुद्धिवाद की प्रधानता, निरंकुशता का विरोध, आलोचनात्मक प्रवृत्ति और सुन्दर भविष्य की आशा विद्यमान थी। श्नों एक महान् दार्शनिक एवं कवि वे जिन्हें धर्मान्ध पादरियों ने जिन्दा जलाया था
लेकिन इन्होंने साहसपूर्वक ईसाई धर्म के विचारों का विरोध किया और कहा कि यह समस्त विश्व ईश्वर का ही स्वरूप है। इनके अनुसार ईश्वर और विश्व दोनों एक ही है यद्यपि वे ईश्वर को अन्तर्यामी और पर दोनों मानते हैं जिसकी दो दृष्टियों से व्याख्या की थी। विश्व को ईश्वर की अभिव्यक्ति माना बा। वेकन ने आगमन पद्धति का प्रयोग किया। हॉब्स ने अपने 'लेबियायन' में कहा है कि प्रकृति के मनुष्यों को सब वस्तुएँ दी है, अत उसका उपयोग करना मनुष्य का प्राकृतिक अधिकार है। पहले मनुष्य पशुवत् एवं असभ्य था लेकिन राज्यों के विकास के साथ मानव का विकास हुआ। अच मनुष्य के जीवन एवं सम्पत्ति की रक्षा का आर राज्य ने ले लिया और मनुष्यों ने अपने लाभ के लिए राज्य की अधीनता स्वीकार कर ली। हॉब्स का इस सन्दर्भ में 'सामाजिक समझौता' नामक सिद्धान्त प्रसिद्ध है। इसके बाद आधुनिक दर्शन का उदय हुआ जिससे समाज के सभी विषयों में वैज्ञानिक ज्ञान का उदय हुआ। दर्शन के निम्नलिखित शाखाओं का विकास हुआ-
(अ) बुद्धिवाद (Rationalism)-
आधुनिक दर्शन के जनक देकार्त हैं। ये बुद्धिवादी थे। बुद्धिवादी दार्शनिकों में स्पिनोजा एवं लाइवनित्ज का भी उल्लेखनीय स्थान है। इन लोगों के अनुसार बुद्धि ही ज्ञान की जननी है। इन लोगों के अनुसार ज्ञान जन्मजात प्रत्ययों पर आधारित होता है जिसमें सार्वभौमिक एवं अनिवार्यता पाई जाती है। अनिवार्य एवं सार्वभौम ज्ञान अनुभव से प्राप्त नहीं हो सकता है क्योंकि सामंजस्य के अनुभव का निरीक्षण एव परीक्षण नहीं हो सकता है। यथार्थ, सार्वभौम एवं अनिवार्य ज्ञान बुद्धि से हो सकता है। बुद्धि की क्रिया से आत्मा में अन्तर्निहित जन्मजात प्रत्यय बाहर आते हैं। बुद्धिवादियों के अनुसार गणित ही आदर्श ज्ञान है जिसमें कुछ जन्मजात प्रत्ययों से निष्कर्ष निकाले जाते हैं, उसी प्रकार सभी विषयों में बुद्धि के द्वारा सत्य ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
(ब) अनुभववाद (Empiricism)-
अनुभववाद के समर्थक लॉक, बर्कले एवं ह्यूम हैं जिनके अनुसार अनुभव ही ज्ञान की जननी है। इन लोगों के अनुसार जनमजात प्रत्यय नामक कोई भी ज्ञान नहीं होता है। जबन के समय मन कोरे कागज या साफ स्लेट के समान होता है जिसमें संवेदना एवं स्व-संवेदना से ज्ञान का उदय होता है। अनुभववादी आगमनात्मक प्रणाली और बुद्धिवादी निगमनात्मक प्रणाली को मानते हैं।
(स) समीक्षावाद (Criticism)
कान्ट ने अपने समीक्षावाद सिद्धान्त में कहा है कि ज्ञान इन्द्रियानुभव और बुद्धि दोनों के योग से बनता है। बुद्धि के बिना इन्द्रिय संवेदन अस्त-व्यस्त, विश्रृंखल एवं असम्बद्ध मात्र होते हैं जो पशुओं को भी होती है उसे ज्ञान नहीं कहा जा सकता है। जब इन्द्रिय संवेदन बुद्धि विकल्प के साँचे में ढलते हैं तो थे निविमत, सम्बद्ध, अनिवार्य, सार्वभौम एवं यथार्थ ज्ञान के रूप में प्रकट होते हैं। कान्ट का कथन है कि "इन्द्रिय संवेदन के बिना बुद्धि विकल्प पंगु या शून्य है और बुद्धि विकल्प के बिना इन्द्रिय संवेदन अन्ध है।" इनका कथन है कि इन्द्रिय संवेदन के बिना वास्तविक ज्ञान नहीं हो सकता है। इसीलिए परमार्थ को अश्श्रेय मानते हैं क्योंकि उनका इन्द्रियानुभव नहीं हो सकता है। कान्ट की समीक्षावाद वैज्ञानिक ज्ञान के समान है।
enlightenment meaning in hindi प्रबोधन का समाजशास्त्र पर प्रभाव (Effect on Sociology of of Enlightenment)-प्राचीन काल में समाजशास्त्र का अध्ययन दर्शनशास्त्र और राजनीतिशास्त्र के अन्तर्गत किया जाता था परन्तु मध्यकाल में सभी विचारों एवं सिद्धान्तों की स्वतन्त्र सत्ता समाप्त हो गई थी। जब सांस्कृतिक पुनर्जागरण, धर्म-सुधार, वैज्ञानिक प्रगति एवं प्रबोधन का विकास हुआ तो अनेक विषयों का स्वतन्त्र अस्तित्व प्रत्यक्ष हुआ। समाजशास्त्र दर्शन पद्धति पर ही आधारित थी अतः इसकी भी दार्शनिक आधार पर विवेचना एवं विश्लेषण होने लगा। बुद्धिवाद, अनुभववाद एवं समीक्षावाद का प्रभाव समाजशास्त्र पर पड़ा परन्तु अनेक समाजशास्त्रियों ने समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र प्राकृतिक विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रयास किया। इस क्षेत्र में सर्वप्रथम प्रयास फ्रांसीसी दार्शनिक ऑगस्त कॉम्टे ने किया। उन्होंने कहा है कि दार्शनिक आधार पर सामाजिक जीवन से सम्बन्धित विषयों का अध्ययन अपर्याप्त है। उन्होंने 1848 ई. में सामाजिक अनुसन्धान के क्षेत्र में सकारात्मक विधि को प्रस्तावित किया। इनके अनुसार सामाजिक घटनाओं का अध्ययन तात्विक सिद्धान्तों के आधार पर नहीं किया जा सकता है बल्कि समाज में जाकर और सामाजिक सम्बन्धों की संरचना के आधार पर करना चाहिए। कॉम्टे ने प्रत्यक्षवाद और वैज्ञानिक विधि को सामाजिक अनुसन्धान का सबसे उपर्युक्त साधन
माना है। इन्होंने आनुभविक आँकड़ों के संग्रह और प्रत्यक्षवादी पद्धति पर विशेष बल दिया। इस प्रकार इनकी विधि प्राकृतिक विज्ञानों के समान बनी। 1930 ई. तक प्रत्यक्षवाद की प्रवृत्ति अमेरिका में भी विकसित हुई और धीरे-धीरे इसका प्रभाव अन्य देशों पर भी पड़ा।
कॉम्टे के प्रत्यक्षवाद की आलोचना आन्तरिक और बाह्य दोनों क्षेत्रों में हुई क्योंकि किसी भी कथन की सत्यता इन्द्रियानुभवों या प्रत्यक्षों के आधार पर नहीं हो सकती है। प्रतीकात्मक अन्तक्रियावाद, पटना क्रियावाद, लोकपद्धति विान, फ्रेंकफर्ट एवं मार्क्सवादी विचारकों ने प्रत्यक्षवाद की तीव्र आलोचना की थी किन्तु बाद में पुनः अनुभववाद को स्वीकार किया जाने लगा जिसे उत्तर अनुभववादी कहा जाता है जिससे अनुसार वैज्ञानिक पद्धति ही ज्ञान, सत्य एवं वैधता का स्रोत नहीं है।
आज समाजशास्त्र के क्षेत्र में विविध पद्धतियों एवं प्रविधियों का समूह विकसित हो गया है जो सभी प्रकार के सामाजिक अनुसन्धान में मान्य है। सांस्कृतिक पुनर्जागरण, धर्म- सुधार आन्दोलन एवं वैज्ञानिक प्रगति से जब प्रबोधन का विकास हुआ तो ज्ञान एवं विज्ञान के कारण समाजशास्त्र का क्षेत्र अत्यन्त विकसित हो गया। आज समाज विज्ञान का अध्ययन एक स्वतन्त्र प्राकृतिक विज्ञान के रूप में होने लगा है। उस पर दर्शन, धर्म, नीतिशास्त्र एवं राजनीति का प्रभाव समाप्त हो गया है। समाजशास्त्र एक पूर्णतः स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में विकसित अवश्य हो गया है। परन्तु इसका सम्बन्ध अन्य विज्ञानों से भी है। ये अन्य विज्ञानों के सहयोग से ही अपने क्षेत्र का विस्तार कर रहा है। वास्तव में सभी स्वतन्त्र विषयों का सम्बन्ध मानव जाति से है अतः सभी विषयों को पूर्णतः स्वतन्त्र विज्ञान नहीं कहा जा सकता है परन्तु वैज्ञानिक विधि का प्रयोग होने से उसमें सार्वभौमिकता, अनिवार्यता एवं यथार्थता एक सीमा तक आ जाती है। इस क्षेत्र में समाजशास्त्र अपना विकास ही कर रहा है।
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