सर कार्ल पॉपर ।के प्रत्यनवादी सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
कार्ल पॉपर के प्रत्यनवादी सिद्धान्त की आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए।
(Critically explain the Karl Popper's positivism theory)
कार्ल पॉपर द्वारा प्रत्यक्षवाद का प्रतिपादन किस प्रकार किया गया है ? स्पष्ट कीजिए।
(How does Karl Poppper contemplate positivism? Explain.)
सर कार्ल पॉपर-उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक समाजशास्त्र का अध्ययन चार्मिक एवं दार्शनिक विचारों के आधार पर किया जाता है जिसमें अनुमान, तर्क, धार्मिक एवं दार्शनिक विचारों, विश्वासों का विशेष महत्त्व था। इस समय तक समाजशास्त्र के निष्कर्ष भी क्रमबद्ध निरीक्षण पर आधारित नहीं था, उसमें यथार्थता का अभाव था। अधिकतर समाजशास्त्री नैतिक पक्षपात की भावना से ग्रस्त थे और काल्पनिक आधार पर एक आदर्श को प्राप्त करने का प्रयास किया करते हैं। फ्रांसीसी समाजशास्त्री एवं दार्शनिक ऑगस्त कॉम्टे से 1848 ई. में समाजशास्त्र में एक सकारात्मक विधि को प्रत्यक्ष किया जो एक वैज्ञानिक विधि एवं प्रत्यक्षवादी विधि वी जिसमें सामाजिक तथ्यों को वैज्ञानिक आधार पर क्रमबद्ध, निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग एवं वर्गीकरण किया। यह विधि प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित है। अतः इसे प्रात्यक्षवादी विधि कहा गया।
सर कार्ल पॉपर- ऑगस्त कॉम्टे के उत्तराधिकारी दुर्खीम ने प्रत्यक्षवादी पद्धति को आगे बढ़ाया और अपने समस्त अध्ययन का आधार बनाया। इन्होंने सामाजिक तव्यों को प्राकृतिक वस्तुओं के समान मानकर उसका वैज्ञानिक आधार पर परीक्षण, निरीक्षण, प्रयोग एवं वर्गीकरण पर बल दिया। इसके लिए इन्होंने कुछ जिवनों की स्थापना की। दुर्खीम ने अपनी प्रत्यक्षवादी पद्धति के आधार पर समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र विज्ञान के रूप में प्रतिष्ठित कराने का प्रयास किया। कार्ल पॉपर ने अपनी प्रत्यक्षवादी धारणा से प्रत्यक्ष का विश्लेषण किया। उन्होंने यह स्पष्ट करने का प्रयास किया कि प्रत्यक्ष की अवधारणा का कारण क्या है और उसकी प्रतिमा की पुनर्व्यवस्था किस प्रकार हो सकती है ? इन्होंने प्रत्यक्षवाद के आधार पर इसे स्पष्ट करने का प्रयास किया और प्रत्यक्षवाद को एक दार्शनिक आधार प्रदान करने का प्रवास किया।
निकायात्मक दर्शन की अवधारणा (Concept of Systematic Philosophy)- थीसवीं शताब्दी में दार्शनिक एवं सामाजिक विचारधारा में गणित और विज्ञान का अत्यधिक प्रभाव था। दार्शनिक दृष्टि से इसके चार प्रमुख पक्ष थे
(1) वस्तुवादी पक्ष,
(2) विश्लेषणात्मक पक्ष,
(3) भाषिक पंक्ष और
(4) निकायात्मक पक्ष।
वस्तुवादी पक्ष में बेडले एवं ग्रीन के प्रत्ययवाद के विपरीत वस्तुवाद की स्थापना की गई जिससे तार्किक परमाणुवाद एवं तार्किक प्रत्यक्षवाद की स्थापना हुई। इसे साधारण भाषादर्शन भी कहा गया है क्योंकि इसकी मान्यता यह है कि हम शब्दों के वास्तविक अर्थ, जो उनके प्रयोग में निहित होते हैं, को समझकर सभी प्रकार के तात्विक एवं संशयात्मक विरोधाभासों से मुक्त हो सकते हैं।
माध्यम का कार्य करते हैं। तथ्यात्मक शोध में तथ्यों का संकलन, वर्गीकरण, व्याख्या एवं सामान्यीकरण प्रत्यक्ष के माध्यम से होता है। पॉपर के तथ्य सम्बन्धी विचार का आधार प्रतिमा है जिसमें विभिन्न संवेदनाओं, दशाओं और अवधारणाओं के अन्तर्गत बाह्य निर्देशों के माध्यम से तथ्यों का प्रत्यक्ष होता है।
ज्ञान की संभावना (Possibility of Knowledge)- समीक्षात्मक यथार्थवादियों के अनुसार तथ्य और विषय में अन्तर होता है। विषय को तथ्य के समरूप नहीं कहा जा सकता है, विषय तथ्य से परे होता है। इन लोगों के अनुसार विषय को मन के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता है। अतः इसका ज्ञान असंभव होता है। एक तत्ववादियों के अनुसार विषय मन की अन्तर्वस्तु है क्योंकि मन से अपनी अन्तर्वस्तु का बोध होता है। इसके समर्थक मन की अतीन्द्रिय शक्ति को अस्वीकार करते हैं जबकि समीक्षात्मक यथार्थवादी मन की अतीन्द्रिय शक्ति को स्वीकार करते हैं। इनके विचारकों के अनुसार यह शक्ति एक्स-रे की शक्ति के समान है। जिस प्रकार से वैज्ञानिक एक्स रे की शक्ति के माध्यम से अप्रत्यक्ष को प्रत्यक्ष करते हैं, उसी प्रकार से समीक्षात्मक यथार्थवादी मन की अतीन्द्रिय शक्ति तथ्यों का प्रत्यक्ष करते हैं। समीक्षात्मक यथार्थवादी बाह्य जगत के अस्तित्व को स्वीकार करता है, परन्तु वे अन्तिम सत्ता के सम्बन्ध में स्पष्ट विचार प्रकट नहीं कर पात है।
सर कार्ल पॉपर- पॉपर का प्रत्यक्ष एवं अनुभव को प्रमाणित करने के सन्दर्भ में कहना है कि अतीन्द्रिय मन की विषय जब तत्व के रूप में स्वीकार हो तो उसे प्रत्यक्ष प्रमाणित होना चाहिए। पॉपर भ्रम एवं सत्य के सम्बन्ध में कहते हैं कि "जब हम किसी विषय को जानते हैं तो उसके सार गुणों या गुणों को समूह को एकत्र कर लेते हैं जो वैज्ञानिक पद्धति से स्वतन्त्र अस्तित्व रखता है और वास्तविक गुणों के साथ जिन्हें यथार्थता निर्दिष्ट करती है। वहाँ पर सत्ता का सार से तादात्म्य रहता है।" पॉपर का भ्रम के सम्बन्ध में कहना है कि "श्रम (Error) वहीं हैं जहीं एकीकरण का अभाव है और वस्तु पर अन्य गुणों का आरोपण है। हम उसी को सत्य मान लेते हैं जो मिथ्या गुणों में सत्य का आरोपण करता है।"
पॉपर के प्रत्यक्षवाद का निष्कर्ष (Conclusion of Popper's Positivism)- पॉपर ने प्रत्यक्षवाद का अवलोकन अत्यन्त सूक्ष्म दृष्टि से किया है। इनकी प्रत्यक्षवादी अवधारणा प्रतिमा और बाह्य निर्देश पर आधारित है जिसके कारण उन्होंने प्रत्यक्ष का अत्यन्त सूक्ष्म अवलोकन किया जिससे इनके प्रत्यक्ष की अवधारणा में सार्वभौमिक, अनिवार्यता, यथार्थता आती है। पॉपर अपने आनुभविक एवं प्रत्यक्षवादी सिद्धान्त के सन्दर्भ में कहते हैं कि "किसी सिद्धान्त को आनुभविक या प्रत्यक्षवादी उसी स्थिति में कहा जा सकता है जब उसका परीक्षण हो सके और सिद्धान्त परीक्षण योग्य तभी होता है जबकि उससे ऐसा कचन स्पष्ट हो जिनकी सत्यता की जाँच अवलोकनों या निरीक्षणों द्वारा की जा सके। यदि वह अवलोकनों के अनुरूप नहीं है तो ऐसी अवस्था में सिद्धान्त को परिवर्तित करना पड़ सकता है।"
सर कार्ल पॉपर- ऑगस्त कॉम्टे ने अपनी प्रत्यक्षवादी विधि के आधार पर समाजशास्त्र को एक स्वतन्त्र वैज्ञानिक आधार प्रदान कराने का प्रयास किया। दुर्सीम का प्रत्यक्षवाद उनके सभी सिद्धान्तों का आधार बना। पॉपर ने अपने प्रत्यक्षवादी अनुसन्धान में 'प्रतिमा' की अवधारणा का विन्यास किया जो एक प्रकार से दुखीम के व्यक्तित्व सम्बन्धी विचारों से साम्य स्खती है। दुर्खीम ने समाज में सामूहिक तत्व के सन्दर्भ में व्यक्तित्व का विवेचन किया है। पॉपर ने प्रतिमा के माध्यम से समाज के व्यक्त्तियों के व्यक्तित्व का विश्लेषण किया है। दोनों के अनुसार व्यक्तित्व का निर्माण समाज के द्वारा होता है। पॉपर के अनुसार व्यक्ति जब अपने मन में संग्रहीत तथ्यों से बनी प्रतिमा को सामाजिक वातावरण, परिस्थितियों, घटनाओं आदि के बाह्य निर्देशों द्वारा स्वीकार करता है तो उसे प्रत्यक्षीकरण कहा जाता है जिसमें सार्वभौमिकता, यथार्थता, अनिवार्यता एवं सत्यता होती है। इस प्रकार पॉपर के अनुसार, सामाजिक घटनाओं एवं तथ्यों के लिए व्यक्ति के हृदय में संग्रहीत प्रतिमा और उससे मिले बाह्य निर्देश ही प्रत्यक्ष के लिए उत्तरदायी है जिसमें सार्वभौमिकता एवं सत्यता होती है।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रत्यक्षवाद के आधार पर कॉम्टे ने समाजशास्त्र को एक वैज्ञानिक आधार प्रदान करने का प्रयास किया जिसके अधूरे कार्य को दुर्खीम ने पूर्ण किया और प्रत्यक्षवाद उनके समाजशास्त्रीय सिद्धान्त का मुख्य आधार बना, जबकि पॉपर ने अपने प्रत्यक्षवादी सिद्धान्त में दार्शनिक सिद्धान्तों के साथ व्यावहारिक सिद्धान्तों का समावेश किया जिससे समाजशास्त्र वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक सिद्धान्त के साथ एक स्वतन्त्र विषय बन सका।
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