analytical positivism प्रत्यक्षवाद क्या है प्रत्यक्षवाद पर दुर्खीम के योगदान की व्याख्या कीजिए।
(What is positivism? Explain of Durkheim's contribution to positivism.)
प्रत्यक्षवाद पर दुर्खीम के योगदान की विवेचना कीजिए।
(Discuss the contribution of positivism for Durkheim)
प्रत्यक्षवाद पर दुर्खीम के योगदान की चर्चा कीजिए।
(Explain of Durkheim's contribution to positivism)
analytical positivism-फ्रांसीसी सामाजिक विचारकों में दुर्खीम का नाम कॉम्टे के 'उत्तराधिकारी' के रूप में सर्वाधिक लोकप्रिय है। इसका मुख्य कारण यह है कि दुर्खीम ने 'समाजशास्त्र को एक विज्ञान मानने पर अधिक बल दिया और कॉम्टे से दो कदम आगे जाकर समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद था वैज्ञानिक पद्धति को अपने ढंग से विकसित करने का प्रयास किया। इसी बात की चर्चा करते हुए प्रो बोगाईस ने लिखा है कि दुर्खीम एक प्रत्यक्षवादी विचारक थे और उस रूप में यह विश्वास करते थे कि सामाजिक अष्कृतिक विज्ञानों की पद्धतियों का उपयोग किया जाना चाहिए। यहीं से दुीम के समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद की शुरुआत होती है।
समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद की व्याख्या (Explanation of Sociological Positivism)
दुबीम का यह मत है कि समाजशास्त्र एक विज्ञान के रूप में अपने को तब तक सुप्रतिष्चित का यह मत है वह वैज्ञानिक विधियों या पद्धतियों का दृढ़ता से अनुसरण न करे। समीरपुर होने वाली यह वैज्ञानिक पद्धति ही समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद है, क्योंकि इस अमाशा में प्रयुक्त होने गाली और वर्गीकरण की वैज्ञानिक कार्यप्रणाली को दृढ़ता से अपनाया समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद की मान्यताओं को अति सुन्दर ढंग से प्रस्तुत करते हुए लिया है। अपने पद्धतिशास्त्र में दुर्जीम इस बात पर बल देते हैं कि भावना से सम्बन्धित सभी विचारों से दूर रहा जाए, तैयक्तिक त्रुटि को पनपने न दिया जाए, अध्ययन के उद्देश्यों को पहले से ही सावधानीपूर्वक परिभाषित कर लिया जाए एवं स्वाभाविक तथ्य व तथ्य 'जैसा कि है और तथ्य जैसा कि होना चाहिए में स्पष्ट भेद कर लेना चाहिए।" ऐसा करने से यथार्थ निष्कर्ष निकालना सरल होगा। यही समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद का सार-तत्व है।
analytical positivism- दुर्बीम के अनुसार समाजशास्त्र की आध्यरान-वस्तु सामाजिक तथ्य हैं। दूसरे शब्दों में, समाजशास्त्र सामाजिक तथ्यों का अध्ययन करता है। अतः हमें सामाजिक तथ्यों का वैज्ञानिक विधि या पद्धति से अध्ययन करना चाहिए। दुखीस में केवल यही नहीं बताया कि सामाजिक तथ्यों के विषय में वैज्ञानिक पद्धति का अनुसरण करते समय किन-किन बातों का ध्यान रखा जाए। इसी उद्देश्य से आपने अपनी पुस्तक 'The Rules of Sociological Method" के द्वितीय अध्याय में सामाजिक तथ्यों के निरीक्षण (Observation) के कुछ विशेष नियम श्री प्रतिपादित किए। दुर्सीम का कहना है कि तथ्यों के निरीक्षण के सम्बन्ध में वैज्ञानिकों में कुछ नास्तियाँ प्रचलित हैं। दुर्शीम के अनुसार तथ्यों के निरीक्षण के सम्बन्ध में एक सबसे महत्त्वपूर्ण भ्रान्ति तो यह है कि अधिकतर विचारक 'विचारों से वस्तुओं की ओर बढ़ने का प्रयत्न करते हैं। इस कथन का तात्पर्य केवल इतना है कि किसी भी चीज के बारे में जो हम विचार रखते हैं उसी को हम 'वस्तु' अर्थात् 'विचारों से वस्तुओं' की ओर बढ़ने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। इसका प्रमुख कारण यह है कि विचार व चिन्तन विज्ञान से पूर्व भी विद्यमान थे जिनका कि एक 'विज्ञान' में खूब प्रयोग किया जाता रहा है। जैसा कि दुर्खीम ने भी लिखा है, "मनुष्य एक परिवेश में तब तक नहीं रह सकता जब तक वह उसके बारे में कोई विचार न बना ले।" यह आवश्यक नहीं है कि उसका यह विचार वास्तविक तथ्यों पर आधारित हो, वह उसका अनुमान मात्र भी हो सकता है। इन अनुमानों के आधार पर जिन विचारों को पनपाया जाता है, वे केवल पूर्व-विचार या पूर्ण धारणाएँ ही होती है और इन्हीं पूर्व-धारणाओं अर्थात् अनुमान पर आधारित विचारों को 'वस्तु' या वास्तविक तथ्य मान लिया जाता है और इन्हीं के आधार पर परिस्थिति की व्याख्या भी की जाती है। इसी बात को एक उदाहरण द्वारा भी समझाया जा सकता है। एक व्यक्त्ति, जोकि एक संयुक्त परिवार व्यवस्था में रहता है, इस प्रकार की व्यवस्था के प्रति एक विशेष धारणा या विचार अपने मन में विकसित कर लेता है, जैसे वह यह सोच सकता है कि 'संयुक्त परिवार एक बुरी वस्तु है' इसी धारणा या विवार या अनुमान को वास्तविक तव्य समझ लेता है और संयुक्त परिवार की व्याख्या करता है। स्पष्ट है कि उसकी यह व्याख्या वास्तविक तथ्यों पर नहीं, बल्कि कुछ अनुमानों या विचारों पर आधारित है। दुर्खीम का मत है कि इस आधार पर जो भी निष्कर्ष निकाले जाते हैं वह वस्तुनिष्ठ कदापि नहीं हो सकते। आपका विचार है कि इसी गत पद्धतिशास्त्र का अनुसरण प्रायः सभी प्रकार के विज्ञानों में, जिनमें समाजशास्त्र भी सम्मिलित है, बहुत दिनों से होता आ रहा है।
analytical positivism- चूंकि दुर्बीम समाजशास्त्र को एक यथार्थ, प्रत्यक्ष तथा वास्तविक विज्ञान की कोटि में लाना चाहते वे, इसीलिए उन्होंने समाजशास्त्र में प्रयुक्त हो रही इस गलत पद्धति की ओर हमारा ध्यान दिलाया एवं समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद की वास्तविक प्रकृति को स्पष्ट किया। साथ ही उन्होंने यह भी विस्तार से बतलाया कि हमने सामाजिक घटनाओं के अध्ययन या निरीक्षण करने के लिए कुछ विशेष नियन प्रतिपादित किए हैं। इन नियमों को संक्षिप्त रूप में अग्रलिखित प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-
समाजशास्त्रीय प्रत्यक्षवाद के नियम (Rules of Sociological Positives)
(1) सामाजिक तथ्यों को वस्तु माना जाए (Social Facts be considered as things)- सामाजिक तथ्यों के निरीक्षण के सम्बन्ध में दुर्खीम के ही शब्दों में पहला और सबसे अधिक मौलिक नियम है-"सामाजिक तथ्यों का वस्तुओं के रूप में विचार किया जाए।" अर्थात् सामाजिक घटनाओं का सामाजिक तथ्यों, जोकि समाजशास्त्र की अध्ययन वस्तु है, को 'वस्तु' के समान समझकर उनका अध्ययन किया जाना चाहिए। दुर्भाग्य से जैसा कि रॉबर्ट बीरस्टीड ने कहा है, "अभी तक अर्थात् दुर्खीम के समय तक समाजशास्त्र वस्तुओं की अपेक्षा अवधारणाओं से सम्बन्धित रहा है।" सामाजिक तथ्यों को 'वस्तु' के रूप में मानने का दुर्खीम का तात्पर्य केवल इतना है कि उनको एक विचार या अवधारणा न मानकर एक ऐसी चीज या वस्तु के रूप में देखा जाए जिसका कि अस्तित्व मनुष्य पर बिल्कुल ही निर्भर रहा है तथा जो बाहरी तौर पर देखी जा सकती है, साथ ही जिसको केवल अनुभव के आधार पर जाना जा सकता है। दुर्खीम के ही शब्दों में, "ज्ञान के वह सभी विषय 'वस्तु' है जोकि केवल मानसिक क्रियाओं द्वारा नहीं जाने जा सकते, बल्कि उनके जानने के लिए हमें निरीक्षण और प्रयोग के द्वारा मस्तिष्क के बाहर से आँकड़े प्राप्त करने होंगे।" इस प्रकार दुर्खीम ने सामाजिक तथ्यों को भौतिक तथ्यों के समान ही माना यद्यपि आप भौतिक और सामाजिक तव्यों में भेद भी मानते हैं। दुर्खीम का मत है यद्यपि सामाजिक तथ्य स्वभाव से मानसिक पुट लिए होने के कारण भौतिक घटना से भिन्न है, फिर भी इस अन्तर का कोई भी प्रभाव उनके वैज्ञानिक अध्ययन पर नहीं पड़ेगा। दूसरे शब्दों में, हमें सामाजिक तथ्यों का अध्ययन भौतिक तथ्यों की तरह से ही करना चाहिए। अर्थात् सामाजिक तथ्यों को वस्तु के समान समझकर ही उनका अध्ययन किया जाना चाहिए, क्योंकि उसी दशा में हम समाज या सामाजिक तथ्यों की वास्तविकता को समझ सकेंगे।
(2) सभी पूर्व-धारणाओं का उन्मूलन (Eradication of all the preconceptions)-दुर्खीम के अनुसार, सामाजिक तथ्यों का 'वस्तुओं' के समान निरीक्षण करते समय एक वैज्ञानिक को अपने मस्तिष्क में विद्यमान सभी पूर्व-धारणाओं का परित्याग कर देना चाहिए, क्योंकि तथ्यों के वस्तुनिष्ठ अध्ययन के लिए यह अत्यन्त आवश्यक है। जैसा कि उपुर्यक्त वर्णन में कहा गया है कि सामाजिक तथ्यों को वस्तु के रूप में समझना चाहिए और इसलिए सामाजिक तथ्यों का भी निरीक्षण वास्तविक रूप में सम्भव है। कोई भी वस्तु जब हम देखते हैं तो उसे देखने से हम उसे पसन्द या नापसन्द करते हैं। इसी पसन्द या नापसन्द के आधार पर हमारे मस्तिष्क में उस वस्तु के विषय में पूर्व-विचार उत्पन्न होता है। दूसरे शब्दों में, सामाजिक तथ्यों के सम्बन्ध में पसन्द या नापसन्द या अन्य कोई विचार, जिसमें पूर्व-विचार या पूर्व-अवधारणाएँ भी सम्मिलित हैं, हमारे मस्तिष्क में जाग्रत होना स्वाभाविक है। दुर्खीम के अनुसार एक वैज्ञानिक को सामाजिक तथ्यों का वास्तविक निरीक्षण करने की स्वतन्त्रता तो है, परन्तु उनके विषय में किसी भी प्रकार की भावना या धारणा को मस्तिष्क में स्थान देने की स्वतन्त्रता नहीं है। दुर्खीम के ही शब्दों में, "अतः समाजशास्त्री को या तो शोध के उद्देश्यों का निर्धारण करते समय अथवा वर्णन करते समय उन अवधारणाओं का, जो विज्ञान से अलग पूर्णतया अवैज्ञानिक आवश्यकता के लिए उत्पन्न हुई है, परित्याग करना चाहिए।" वास्तव में वैज्ञानिक या समाजशास्त्री तो सामाजिक तथ्य को वस्तु के रूप में वैसा ही देखता है जैसा कि वह वास्तव में है। यही वैज्ञानिक वस्तुनिष्ठता है और यही दुर्खीम की पद्धति की आधारशिला भी, इसके बिना कोई भी अध्ययन वैज्ञानिक नहीं हो सकता। दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि एक वैज्ञानिक को अपने मस्तिष्क (विचार, अनुभूति और क्रिया) का उपयोग तो करना चाहिए, परन्तु अपनी भावनाओं या पूर्व- अवधारणाओं का प्रभाव अपने अध्ययन पर नहीं पड़ने देना चाहिए। उदाहरणार्थ, हम अन्तर्जातीय विवाह को पसन्द नहीं करते, परन्तु यदि हमें इसी विषय का अध्ययन करना है तो उससे सम्बन्धित तव्यों को एकत्रित करने तथा उनका विश्लेषण एवं निरूपण करते समय हमें अपनी नापसन्द (अर्थात् यह पूर्व-धारणा कि हम अन्तर्जातीय को पसन्द नहीं करते) को अपने अध्ययन क्षेत्र से बाहर ही रखना चाहिए। दुर्खीम के अनुसार सामाजिक तथ्यों के निरीक्षण में यह बात बहुत आवश्यक है। analytical positivism-
(3) कतिपय सामान्य वाहा विशेषताओं द्वारा पूर्व-परिभाषित घटनाओं का समूह (A group phenomena defined in advance by certain common external characteristics)-दुखीय of में कतिपय सामान्य बाह्य कोटा में रयेिक समाज का समूह होना चाहिए और इस प्रकार परिभाषित सभी घटनाएँ इरा खमा पर्न सक्मिलित की जानी चाहिए। दुर्खीम का कथन है कि इस नियम के अन्तर्गत एक समाह में सम्मिलित प्रयत्न होना चाहिए कि वह उन वस्तुओं या तथ्यों की परिभाषा करें जिनका कि समाजशास्त्री का यह प्रयत्न हो उसके अध्ययन से सम्बन्धित हैं। और भी स्पष्ट शब्दों में, प्रत्येक वैसे निकालन किसन अध्ययन-क्षेत्र में आगे बढ़ने से पहले यह आवश्यक है कि वह उन घटनाओं है। वैवानियत संध्या की, जिसका कि वह अध्ययन करेगा, बाहा विशेषताओं के आधार पर परिभाषित कर है। यहाँ बाह्य विशेषताओं से तात्पर्य उत्न विशेषताओं से है जो कि बाहरी रूप में देखी जा सकें अर्थात एक वैज्ञानिक को निरीक्षण योग्य विशेषताओं के आधार पर सामाजिक घटनाओं की परिभाषा करखी चाहिए और तभी पूर्व-परिभाषित इन सामाजिक घटनाओं को अपनी अध्ययन- वस्तु मानना चाहिए। दुर्बीम का कथन यह है कि हम दिन-प्रतिदिन अधिकांश समय अनेक शब्दों जैसे राज्य, सम्पत्ति, परिवार, अपराध आदि का प्रयोग करते हैं और इन सभी से हम कुछ विशेष अर्थ लगाते हैं, परन्तु वह अर्थ अत्यन्त साधारण व अस्पष्ट होता है जो कि वैज्ञानिक अध्ययन के लिए निरर्थक ही नहीं बल्कि हानिकारक भी है। अतः हर दशा में हमको घटनाओं को बाह्य विशेषताओं के आधार पर पूर्व परिभाषित करना चाहिए। ये ही घटनाएँ विज्ञान की अध्ययन-वस्तु बन सकती हैं। दुर्खीम के अनुसार पूर्व-परिभाषित सामाजिक घटनाएँ अत्यधिक यथार्थता लिए होती हैं, क्योंकि इनमें ऐसी विशेषता वाली सभी घटनाएँ होंगी जिन्हें कि हमने अपनी इच्छा से न चुनकर बाह्वा विशेषताओं के आधार पर चुना है। दुर्खीम कर कथन है कि प्रत्येक विज्ञान को इसी प्रकार सामाजिक घटनाओं को परिभाषित करके अपबा अध्ययन-क्षेत्र निर्धारित करना चाहिए।
(4) सामाजिक तथ्यों की वैयक्तिक अभिव्यक्तियों से स्वतन्त्र अनुसन्धान (Investigation independent of individual manifestations of social facts)- यह नियम दुर्खीम के ही शब्दो में, "जब समाजशास्त्री सामाजिक तथ्यों की किसी व्यवस्था को अनुसन्धान के लिए स्वीकार करे तो उसका यह प्रयास होना चाहिए कि वह उन पर एक ऐसे पहलू से भी विचार करे जो कि उनकी वैयक्तिक अभिव्यक्तियों से स्वतन्त्र हो।" सामाजिक तथ्यों के निरीक्षण से सम्बन्धित इस नियम में दुर्सीम ने यह बताने का प्रयत्न किया है कि एक समाजशास्त्री को सामाजिक तथ्यों को उनकी वैयक्तिक अभिव्यक्तियों से अलग करके ही अध्ययन करना चाहिए, क्योंकि बिना इसके अध्ययन में वस्तुनिष्ठता न आ सकेंगी और अध्ययन व्यक्तिनिष्ठ ही रहेगा।
उपर्युक्त विवेचना से स्पष्ट है कि दुर्खीम सामाजिक तथ्यों के अध्ययन के सम्बन्ध में विशेष रूप से इस बात पर बल देते हैं कि सामाजिक घटनाओं के अध्ययन में समस्त प्रकार की भावनाओं, पूर्व- धारणाओं आदि से हमें बचना चाहिए, वैयक्तिक समीकरण को अध्ययन क्षेत्र से बाहर रखना चाहिए। विषय वस्तु को पहले ही सावधानी से परिभाषित कर लेना चाहिए और स्वाभाविक आँकड़े (Natural) data) जिस रूप में हैं या जैसे हैं, उसी रूप में या वैसे ही उन्हें ग्रहण करना चाहिए, न कि 'कैसा होना चाहिए' इस रूप में और भी स्पष्ट शब्दों में कहा जा सकता है कि दुर्खीम का विश्वास था जि वैज्ञानिक अध्ययन के क्षेत्र में व्यक्तिगत पक्षपात, उद्वेग, उचित-अनुचित का मान, अध्ययन-वस्तु तथा अध्ययन के उद्द्देश्य के सम्बन्ध में अस्पष्ट धारणा, नैतिक आदर्श आदि का रहना खतरे से खालती नहीं होता और सामान्यतः इससे वस्तुनिष्ठ अध्ययन में तथा वैज्ञानिक नियमों के प्रतिपादन में पर्याप्त बाधा पहुँचती है। वास्तव में इन सबसे प्रभावित वैज्ञानिक नियम' यदि हम उन्हें वैज्ञानिक कहते भी हैं, अपने विकृत रूप में प्रकट होते हैं। इसीलिए एक वैज्ञानिक को अपने अध्ययन कार्य के दौरान इन सबसे अपने को दूर रखना चाहिए।
analytical positivism-इस सन्दर्भ में यह भी उल्लेखनीय है कि सामाजिक तथ्यों की व्याख्या के सम्बन्ध में दुर्खीम ने तीन नियमों का प्रतिपादन किया है। इन नियमों को दुर्खीम के ही शब्दों में निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है-
(1) "जब हमें किसी सामाजिक घटना की व्याख्या करनी हो तो हमें उसके उत्पन्न करने वाले फलंप्रद कारण को तथा उस घटना के द्वारा पूरा किए जाने वाले प्रकार्य को अलग-अलग खोजना चाहिए।"
(2) "एक सामाजिक तथ्य के निर्धारक कारण को पूर्वगामी सामाजिक तथ्यों में ही ढूँढ़ना चाहिए, न कि वैयक्तिक चेतना की अवस्थाओं में साथ ही सामाजिक तथ्य का प्रकार्य सर्वया किसी राजनीतिक उद्द्देश्य के सम्बन्ध में खोजना चाहिए।"
(3) "किसी भी महत्त्व की सभी सामाजिक प्रक्रियाओं की प्रथम उत्पत्ति को सामाजिक समूह की आन्तरिक संरचना में ही खोजा जाना चाहिए।"
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