peacock wiseman hypothesis पीकॉक वाइजमैन परिकल्पना सार्वजनिक

peacock wiseman hypothesis पीकॉक वाइजमैन परिकल्पना सार्वजनिक 


peacock wiseman hypothesis लोक व्यय में वृद्धि की व्याख्या करने में पीकॉक-वाइजमैन अवधारणा के महत्व पर प्रकाश डालिए।

[सार्वजनिक व्यय की वृद्धि की व्याख्या में मयूर-वाइजमैन परिकल्पना के महत्व पर चर्चा करें)

अथवा

पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना का सार्वजनिक व्यय के बारे में आलोचनात्मक व्याख्या कीजिए। [Critically examine Peacock-Wiseman hypothesis with regard to public expenditure. अथवा पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना को समझाइए और दर्शाइए कि यह परिकल्पना वैगनर के नियम से किस प्रकार भिम है?

[पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना की व्याख्या करें और बताएं कि यह परिकल्पना वैगनर के नियम से किस प्रकार भिन्न है 

उत्तर-

पीकॉक-वाइजमैन परिकल्पना
(मोर विज़मैन परिकल्पना)

 

इस परिकल्पना को प्रतिपादित करने का श्रेय ब्रिटेन के एलन टी. पीकॉक (Allen T. Peacock) तया जैक वाइजमैन (Jack Wiseman) को है जिन्होंने अपने देश में 1890 से 1955 तक के सार्वजनिक व्ययों का अध्ययन कर 1961 ई. में प्रकाशित The Growth of Public Expenditure in the United Kingdom' नामक पुस्तक में इस परिकल्पना को प्रस्तुत किया। इनके अनुसार, "करदाताओं में कर वृद्धि के प्रति स्वाभाविक प्रतिरोध होता है लेकिन करों में वृद्धि हो जाने के पश्चात् उनमें इसे स्वीकार करने की प्रवृत्ति बन जाती है और वे जये कर स्तर को पुराने कर स्तर पर ले जाने के लिए बल नहीं देते। आर्थिक संकटों और विशेषतः युद्ध के दौरान सार्वजनिक व्यय में अल्पकाल के लिए अनिवार्य रूप से वृद्धि की आवश्यकता होती है जिसके लिए वे अपनी पुरानी कर सीमा से आगे बढ़ने को तैयार हो जाते हैं और कर सीमा में उस वृद्धि को स्वीकार कर लेते हैं जिसका साधारणतः वे विरोध करते है। संकट काल समाप्त होने पर वे करारोपण के नये स्तर को अपनाने को तैयार रहते हैं, जिसस ऐसे अनेक सार्वजनिक व्ययों की व्यवस्था हो जाती है जिसकी अन्यथा कोई व्यवस्था नहीं हो सकती थी।"

इन लेखकों ने कर आगम एवं सार्वजनिक व्यय में वृद्धि की परिकल्पना को इस प्रकार व्यक्त किया है- 'सार्वजनिक व्ययों में निष्कोण (Smooth) एवं सतत् (Continuous) रूप में वृद्धि नहीं होती बल्कि टेढ़े-मेढ़े (Jerka) एवं पेड़ीदार (Stepwise) रूप में वृद्धि होती है। किसी सामाजिक एवं अन्य बाधा या समस्या के समय सार्वजनिक व्ययों में वृद्धि की एक साथ जरूरत होती है जिसे सार्वजनिक आये से पूर्ण नहीं किया जा सकता। प्रारम्भ में सार्वजनिक व्ययों के अपर्याप्त भार के कारण आय तत्व महत्वपूर्ण रहता था तया सार्वजनिक व्यय में वृद्धि को रोकता या लेकिन अब ऐसा नहीं होता चल्कि सार्वजनिक व्यय बढ़ जाते हैं और रत् आय को कम घोषित कर देते हैं।"

इस प्रकार हम देखते हैं कि इस परिकल्पना के अनुसार सरकार अपनी राजस्व प्राप्तियों में वृद्धि कर पाने के कारण सार्वजनिक व्यय में वृद्धि कर सकती है। इस प्रकार सार्वजनिक व्यय एक नये और ऊँचे स्तर पर आ टिकता है। इस सारी प्रक्रिया के विभिन्न चरणों को कई शब्दावलियों से पुकारा जाता है जो निम्न प्रकार हैं-

(1) निरीक्षण प्रभाव (Inspection Effect) युद्ध तवा संकटकाल में सार्वजनिक व्यय में वृद्धि होने पर सरकार और जनता सार्वजनिक आय की स्थिति की समीक्षा करती है। इसी को निरीक्षण प्रभाव कहा जाता है। इसके अन्तर्गत सरकार बढ़ते व्ययों की वित्त व्यवस्था के लिए आवश्यक समायोजन भी करती है।

 (2) कर सहनशीलता (Tax Tolerance) जब सार्वजनिक आगम बढ़ते हुए सार्वजनिक व्ययों की तुलना में कम रह जाता है तो जनता अधिक कर सहने को तैयार हो जाती है। इसी को कर सहनशीलता कहा जाता है।

(3) प्रतिस्थापन प्रभाव (Displacement Effect)- कर एवं सार्वजनिक व्यय के पुराने स्तर से नये स्तर पर आने की प्रक्रिया को ही प्रतिस्थापन प्रभाव कहा जाता है।

(4) केन्द्रीयकरण प्रभाव (Concentration Effect) सार्वजनिक व्यय में निरन्तर वृद्धि का यह परिणाम होता है कि राष्ट्रीय आय का पहले से बड़ा अनुपात सार्वजनिक व्यय के रूप में प्रयोग किया जाता है। इसी को केन्द्रीयकरण प्रभाव कहा जाता है।

पीकॉक-वाइजमैन की परिकल्पना की आलोचना
(मोर-वाइजमैन परिकल्पना की आलोचना)

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