भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता: कारण परिणाम और निवारण के उपाय

ग्रामीण ऋणग्रस्तता क्या है इसके कारण एवं परिणाम

भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता: कारण परिणाम और निवारण के उपाय


ग्रामीण-ऋणग्रस्तता

भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता की प्रकृति, आकार एवं कारणों की विवेचना कीजिए । ऋणग्रस्ता के नियमन हेतु सरकार ने क्या उपाय किये हैं ?
[Discuss the nature, magnitude and causes of rural indebtedness in India. What measure have been taken by the government to regulate the indebtedness?]
अथवा
" भारतीय किसान ऋण में जन्म लेता है, ऋण में जीवन व्यतीत करता है तथा ऋण में मर जाता है।" (शाही आयोजन) विवेचना कीजिए।
उत्तर- भारतीय कृषक समय-समय पर ऋण लेता रहता है, परन्तु वह अपना ऋण चुकाने की स्थिति में नहीं होता, क्योंकि या तो उस पर ऋणभार की अधिकता होती है या उसका विपणन योग्य अतिरेक इतना कम होता है कि वह ऋण से मुक्ति पाने में असमर्थ रहता है। इसलिए कहा जाता है कि "भारतीय किसान ऋण में जन्म लेता है, ऋण में जीवन व्यतीत करता है तथा ऋण में ही मर जाता है।" लघु और सीमान्त किसानों के साथ-साथ ग्रामीण समाज के दूसरे कमजोर वर्गों ( भूमिहीन श्रमिक, दस्तकार आदि) की स्थिति भी ऐसी ही है।
ग्रामीण ऋणग्रस्तता की प्रकृति एवं आकार
(Nature and Size fo Rural Indebtedness)
भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा कराये गये 1951-52 में 'अखिल भारतीय ग्रामीण साख सर्वेक्षण' तथा 1961-62 'अखिल भारतीय ग्रामीण ऋण एवं निवेश सर्वेक्षण' ग्रामीण ऋणग्रस्तता के बारे में उपयोगी जानकारी प्रदान करते हैं। इन सर्वेक्षणों के अनुसार 1951-52 से लेकर 1961-62 तक ऋणग्रस्त ग्रामीण परिवारों के अनुपात में कोई परिवर्तन नहीं आया। लगभग 69 प्रतिशत कृषक परिवार तथा 52 प्रतिशत गैर कृषक परिवार ऋणग्रस्त थे। प्रति ऋणग्रस्त कृषक परिवार की औसत ऋण राशि 1951-52 में ₹526 थी, जो 1961-62 में बढ़कर ₹708 (अर्थात् 35 प्रतिशत की वृद्धि ) हो गई। प्रति ऋणग्रस्त गैर-कृषक परिवार की औसत ऋण राशि 1951-52 में ₹249 थी, जो 1961-62 में बढ़कर ₹ 430 (अर्थात् 35 प्रतिशत की वृद्धि ) हो गई। औसत ग्रामीण ऋण के बारे में तीन पूर्वी राज्यों (पश्चिमी बंगाल, असम तथा उड़ीसा) की स्थिति सबसे नीचे (Lowest ) थी। दूसरी ओर राजस्थान में प्रति परिवार औसत ऋण की मात्रा सबसे अधिक थी। आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु और कर्नाटक के दक्षिणी राज्यों में भी ग्रामीण ऋणग्रस्तता अधिक थी। 1971-72 में सम्पन्न खिल भारतीय ग्रामीण ऋण एवं निवेश सर्वेक्षण' के अनुसार, भूमिहीन श्रमिकों, ग्रामीण दस्तकारों तथा सीमान्त कृषकों की अनुत्पादक कार्यों के निमित्त उधार की वार्षिक आवश्यकता ₹340 करोड़ थी, जबकि लघु कृषकों की अनुत्पादक कार्यों के लिये उधार की वार्षिक आवश्यकता ₹250 करोड़ थी। सिवरमन कमेटी (1976) ने अनुत्पादक कार्यों के निमित्त ग्रामीण समाज के इन वर्गों के लिये उधार की वार्षिक आवश्यकता क्रमशः ₹170 करोड़ और ₹125 करोड़ आँकी थी। संस्थागत स्रोत से कृषि साख की कुल राशि 1992-93 में ₹15,169 करोड़ थी, जो 2011-12 में बढ़कर ₹41,80,4860 करोड़ हो गई। 2012-03 के कृषि ऋण प्रभाव का लक्ष्य ₹5,75,000 करोड़ निर्धारित किया गया था।


ग्रामीण ऋणग्रस्तता के कारण
(Causes of Rural Indebtedness)
भारत में ग्रामीण ऋणग्रस्तता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं-
1. ग्रामीणों की निर्धनता:- ग्रामीण ऋणग्रस्तता का मुख्य कारण ग्रामीणों की निर्धनता है। उन्हें विभिन्न कार्यों के लिये ऋण लेना पड़ता है, क्योंकि उनके पास बचतों का पूर्णत: अभाव होता है। जिस तरह ग्रामीणों की निर्धनता उन्हें ऋण लेने के लिये बाध्य करती है, उसी तरह निर्धनता (कम आय ) के कारण उनका ऋणग्रस्तता से सहज छुटकारा भी असम्भव होता है।

2. भूमि पर सुधार करने की इच्छा:-जर्मीदारी उन्मूलन के पश्चात् किसानों में अपनी भूमि पर सुधार करने की इच्छा जाग्रत हुई है, जो एक स्वस्थ प्रवृत्ति है। भूमि खरीदने या भूमि पर सुधार करने में कोई बुराई नहीं है, किन्तु यह सब कार्य भूतकालीन बचत द्वारा किया जाना चाहिए, ऋण लेकर नहीं। व्यवहार में इन कार्यों के लिये ऋण का आश्रय लिया जाता है।

3. सामाजिक रीति-रिवाज एवं मुकदमेबाजी:-अधिकांश ग्रामीण व्यक्ति अशिक्षित, अज्ञानी और रूढ़िवादी हैं। उनके बहुत से खर्चे ऐसे हैं, जो उन्हें ऋण लेने के लिये विवश करते हैं। वे सामाजिक रीति-रिवाजों से बँधे हुए हैं। जन्म, मृत्यु, विवाह तथा धार्मिक उत्सवों पर उनका समूचा व्यय अनावश्यक एवं अनुत्पादक होता है। ग्रामीणों में मुकदमेबाजी भी अधिक पाई जाती है, जो अत्यधिक खर्चीला कार्य है । इन सभी कार्यों पर ग्रामीण व्यक्ति ऋण लेकर खर्च करने में नहीं चूकते। मुकदमेबाजी किसानों के लिए उतना ही प्रिय हैं जितना कि अंग्रेजों के लिए क्रिकेट का खेल।
4. पैतृक ऋण:- अधिकांश ग्रामीणों को उत्तराधिकार के रूप में पूर्वजों का ऋण प्राप्त होता है, जिसे चुकाना वे अपना नैतिक कर्तव्य समझते हैं।
5. साहूकारी प्रणाली:-साहूकारी प्रणाली ग्रामीण ऋणग्रस्तता के लिए पर्याप्त सीमा तक उत्तरदायी है। साहूकार ग्रामीणों को उधार लेने के लिए उकसाते हैं, उनकी भूमि बन्धक रखकर ऋण देते हैं, उनसे ऊँचा ब्याज वसूल करते हैं और जब ऋण की रकम बढ़कर बहुत अधिक हो जाती है, तब ऋणी की भूमि हड़प लेते हैं। भूमिहीनों को ऋण के बदले जीवनभर साहूकार के यहाँ बँधुआ मजदूर के रूप में काम करना पड़ता है।

6. कृषि की मानसूनी निर्भरता:- भारत में अधिकांश कृषि जोतें अनार्थिक आकार की हैं, जिन पर खेती करना कोई लाभदायक कार्य नहीं है। देशभर में दो-तिहाई भूमि पर सिंचाई की सुविधाओं का अभाव है अर्थात् फसल का अच्छा-बुरा होना पूर्णतया मानसून पर निर्भर है। अतः सूखा-उन्मुख क्षेत्रों तथा अनार्थिक जोत वाले किसानों को उपभोग कार्यों के निमित्त भी ऋण लेना पड़ता है।

7. गैर-कृषि रोजगार का अभाव:- ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि धन्धों का अभाव है। अधिकांश ग्रामीण जनसंख्या कृषकों और भूमिहीन के रूप में के लिये सीमित कृषि भूमि पर निर्भर है। यन्त्रीकरण के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में रोजगार की मात्रा घटी है। फलत: अधिकांश ग्रामीण परिवार निर्धन एवं ऋणग्रस्त बने हुए हैं।

ग्रामीण ऋणग्रस्तता के परिणाम

(Result of Rural Indebtedness) ग्रामीण ऋणग्रस्तता भारतीय किसानों की बढ़ती हुई निर्भरता का 'कारण' और 'परिणाम' दोनों हैं। साहूकार से ऋण लेने के लिए भूमि बन्धक रखने वाले बहुत से किसानों को अन्ततोगत्वा अपनी भूमि से हाथ धोना पड़ता है। ऋणी किसान की खेती करने में अधिक रुचि नहीं होती, क्योंकि उसकी अधिकांश उपज ब्याज और मूलधन चुकाने में चली जाती है। उसकी कार्यक्षमता घट जाती है, जिसका कृषि उत्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऋणी किसान को फसल तैयार होते ही कम कीमतों पर साहूकार के हाथों बेचनी पड़ती है। दूसरी ओर, साहूकार या व्यापारी से बीज, उर्वरक तथा उपभोक्ता पदार्थ खरीदते समय उसे ऊँची कीमत चुकाने के लिए बाध्य किया जाता है।
सामाजिक दृष्टि से ग्रामीण ऋणग्रस्तता स्वतन्त्र कृषकों के स्थान पर भूमिहीन श्रमिकों एवं बटाईदारों को जन्म देती है। जहाँ भूमिहीन श्रमिकों के पास बन्धक रखने के लिए कुछ नहीं होता, वे स्वयं को ही बन्धक रख देते हैं तथा साहूकारों या बड़े-बड़े भूस्वामियों के बन्धुआ मजदूर बन जाते हैं। देश के अनेक भागों में भूमिहीन श्रमिक और छोटे किसान, जो ऋण के चक्कर में अपनी भूमि गवाँ चुके है, साहूकारों और व्यापारियों के विरुद्ध हिंसक आन्दोलन पर उतारू हो गये हैं।



ऋणग्रस्तता के नियमन हेतु सरकारी उपाय
(Measures to Regularise Indebtedness)
ग्रामीण ऋणग्रस्तता के नियमन हेतु सरकार ने निम्न उपाय किये हैं:-
1. ऋण:- भार में कमी पुराने ऋणों के निपटारे हेतु भारत के लगभग प्रत्येक राज्य में कोई-न-कोई है। इन कानूनों के अन्तर्गत जिन किसानों पर पैतृक ऋण का भार अत्यधिक है, वे ऋण का कानून परिमाण घटाने के लिए आवेदन कर सकते हैं। सदुपयन्त ऋण का आकार घटाने तथा साधारण वार्षिक किश्तों में अदायगी सुनिश्चित करने के लिए ऋण एवं ऋणदाता के प्रतिनिधियों को सम्मिलित करते हुए समझौता बोर्ड की स्थापना की जा सकती है। अधिकांश राज्यों में पैतृक ऋणों को अनिवार्य रूप से घटाने तथा कुछ मामलों में उन्हें निरस्त करने के कानून भी हैं, परन्तु अपनी अज्ञानता या साहूकार से भयभीत होने के कारण कृषक इन कानूनों का लाभ नहीं उठा पाते हैं।
2. भूमि:-के हस्तान्तरण पर रोक कुछ राज्यों में किसानों द्वारा पेशेवर साहूकारों को अपनी भूमि बेचे जाने पर रोक लगाने के कानून पास किये गये हैं, ताकि कृषि भूमि का गैर कृषक वर्ग की ओर हस्तान्तरण न हो पाये।
3. साहूकारों:-पर नियन्त्रण राज्य सरकारों ने साहूकारों के क्रिया कलापों पर नियन्त्रण हेतु कई उपाये किये हैं, जैसे उनके लिए रजिस्ट्रेशन कराने तथा लाइसेन्स लेने की अनिवार्यता, साहूकारों द्वारा खड़ी फसल की कुर्की कराये जाने पर प्रतिबन्ध, उनके लिये हिसाब-किताब नियमित रूप से रखने की अनिवार्यता, व्याज की दरों पर नियन्त्रण आदि ।
4. लगान:-वसूली की प्रशासनिक विधि में सुधार राज्य सरकारों ने छोटे किसानों पर लगान का - भार घटाकर तथा लगान वसूली की प्रशासनिक विधि में सुधार लाकर उन परिस्थितियों के निवारण का प्रयास किया है, जो परिस्थितियों पहले किसानों को साहूकार से ऋण लेने के लिये बाध्य करती थीं। 5. ऋणग्रस्तता की समाप्ति तथा बंधुआ श्रम का उन्मूलन - 20 सूत्री कार्यक्रम के अन्तर्गत जुलाई 1975 में भारत सरकार ने ग्रामीण ऋणग्रस्तता की समाप्ति हेतु साहूकारों द्वारा सीमान्त किसानों, भूमिहीन मजदूरों तथा ग्रामीण दस्तकारों से ऋणों की वसूली करने पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

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